MP News: मध्य प्रदेश के डिंडोरी जिले की महिलाएं पानी के लिए रोज़ तय कर रही हैं मीलों का सफर

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MP News: मध्य प्रदेश के डिंडौरी जिले के रकरिया गांव की महिलाएं आज भी 3 किलोमीटर दूर दूसरे गांव से पानी लाने को मजबूर हैं। ये कोई फिल्मी कहानी नहीं, हकीकत है उस भारत की जहां 21वीं सदी में भी प्यास बुझाना जंग से कम नहीं। आखिरकार, थकी-हारी महिलाओं ने कलेक्टर कार्यालय का रुख किया और प्रशासन से गुहार लगाई कि “हमें पानी चाहिए, बस पानी।”

पानी के लिए रोज़ाना 3 किमी की सफर

डिंडौरी जिले ले रकरिया गांव की करीब 50 से अधिक महिलाएं हर दिन सुबह-सुबह खाली मटके लेकर निकलती हैं – मंज़िल होती है पड़ोसी गांव का हैंडपंप या कुआं। न धूप की परवाह, न सुरक्षा की चिंता। एक महिला ने बताया, “हमारे गांव के नल सालों से बंद पड़े हैं। बच्चों को छोड़कर, खेत छोड़कर हम बस पानी के लिए दौड़ते हैं।” यह संघर्ष न केवल शारीरिक है, बल्कि सामाजिक और मानसिक रूप से भी थका देने वाला है।

कलेक्टर कार्यालय पहुंची महिलाएं

डिंडौरी जिले ले रकरिया गांव की महिलाएं थक-हारकर आखिर कर हिम्मत जुटाई और डिंडौरी कलेक्टर कार्यालय पहुंचीं। उन्होंने प्रशासन को अपनी पीड़ा सुनाई और मांग की कि गांव में जल्द से जल्द पेयजल की व्यवस्था की जाए। महिलाओं ने कहा कि गांव में जलजीवन मिशन के तहत काम अधूरा है, और पाइपलाइन बिछाने के बाद भी सप्लाई नहीं हो रही। प्रशासन ने आश्वासन दिया, लेकिन भरोसे से ज्यादा अब हकीकत चाहिए।

विकास की रफ्तार या उपेक्षा की कहानी?

मध्य प्रदेश सरकार की ‘हर घर जल’ योजना का सपना रकरिया गांव में अधूरा ही रह गया है। क्या यह सिस्टम की असफलता है या प्राथमिकता की कमी? जबकि शहरी इलाकों में RO और मिनरल वॉटर आम बात है, वहीं रकरिया जैसी जगहों पर बूंद-बूंद को तरसना एक बड़ी विडंबना है। सवाल ये है कि क्या विकास की गाड़ी वाकई गांवों तक पहुंची है या बस कागज़ों पर दौड़ रही है?

महिलाओं पर दोहरी मार पानी का बोझ और घर की जिम्मेदारियां

गांव की महिलाओं पर पानी की जिम्मेदारी एक बोझ बन चुकी है। रोज़ाना की यह मशक्कत न केवल उनके शरीर को थकाती है, बल्कि समय और ऊर्जा भी निगल जाती है। बच्चियों की पढ़ाई पर असर पड़ता है, बुजुर्ग बीमार पड़ते हैं और पूरे परिवार की दिनचर्या अस्त-व्यस्त हो जाती है। यह सिर्फ ‘पानी की किल्लत’ नहीं, एक पूरे जीवन चक्र की अव्यवस्था है।

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देखें जनता क्या कहती है?

सोशल मीडिया और स्थानीय चर्चाओं में लोग इस मुद्दे पर आक्रोशित हैं। कई लोगों का कहना है कि यह तो बुनियादी हक है – “पानी जैसी मूलभूत चीज़ के लिए अगर महिलाएं कलेक्टर कार्यालय जाएं तो सोचिए, हालात कितने खराब होंगे।” वहीं कुछ ने सवाल उठाया कि जल जीवन मिशन का बजट और इस योजना का पैसा आखिर गया कहां? आम जनता यह जानना चाहती है कि योजनाओं का जमीनी असर कब दिखाई देगा।

रकरिया की ये कहानी अकेले एक गांव की नहीं, मध्य प्रदेश के कई हिस्सों की सच्चाई है। अब समय आ गया है कि “विकास” सिर्फ भाषणों और विज्ञापनों तक न रहे, बल्कि हर गांव की प्यास बुझाए। आपका क्या मानना है – क्या सरकार को ऐसे गांवों की प्राथमिकता बदलनी चाहिए? नीचे कमेंट करें और अपनी राय साझा करें।

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